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जेंडर डिस्क्रिमिनेशन (लैंगिक भेदभाव) अब खत्म?


 

आए दिन कई लोगों से सुनने को मिलता है कि अब जेंडर डिस्क्रिमिनेशन (लैंगिक भेदभाव) बिल्कुल खत्म हो चुका है, या फिर कुछ लोग मानते हैं कि थोड़ा बहुत तो है लेकिन अब उतना नहीं रह गया, महिलाओं के पक्ष में कई कानून बने हैं, वे पढ़ रहीं हैं और जॉब कर रही हैं, क्या सच में ऐसा ही है? आइए आकलन करते हैं।

 

क्या लड़कियों की पहुंच उच्च शिक्षा तक है?


नहीं! आज भी लड़कियां अपनी शिक्षा के लिए अपने घर के पुरुषों पर ही निर्भर है, यानी क्या पढ़ना है? कितना पढ़ना है? कहाँ तक पढ़ना है यहां तक कि अपने कैरियर का चयन भी वह अपने घर के पुरुषों के इच्छानुसार ही तय करती है (अगर कैरियर बनाने की अनुमति मिले तो) वरन उसे उतना ही पढ़ाया जाता है, जितने में उसे एक अच्छा दूल्हा मिल जाए और वो एक अच्छी कुशल गृहणी बन जाए। प्रथम प्राथमिकता उसके कैरियर को नहीं बल्कि घर-गृहस्थी को दी जाती है, उसके बाद अगर उसके ससुराल वाले चाहें तो वो कैरियर पर फोकस कर सकती है, वो भी अपने घर-गृहस्थी की सभी जिम्मेदारियां और काम निपटाने के बाद।

 

क्या लड़कियां शादी के बाद अपना सरनेम कैरी करती हैं?


पुरुषों के पास अपना नाम (सरनेम) रखने का प्रिविलेज तो है ही साथ में पत्नी के नाम के पीछे यानी सरनेम पर अपना ठप्पा लगाने का एक्स्ट्रा प्रिविलेज अलग से है मानो वो पत्नी नहीं बल्कि पुरुष की कोई वस्तु या संपत्ति हो जिस पर उसका (पति) मालिकाना हक हो।


धार्मिक कर्मकांडो में महिलाओं का स्थान

हम कितना भी ज़ोर लगा लें ये साबित करने में कि धर्म मे महिलाओं का स्थान देवी तुल्य या पूजनीय है परंतु हमारी करनी, हमारी कथनी पर भारी पड़ जाती है। आज भी पूर्वजों को पिंडदान या मृतक को अग्नि देने व अन्य कार्यों के लिए घर के लड़कों को ही ढूंढा जाता है, यदि किसी के पुत्र न हुआ तो ये कर्मकांड करीबी रिश्तेदारों द्वारा किया जाता है परंतु बेटियों को इन कार्यों के लिए पराया ही समझा जाता है। 

                     यही नहीं शादी-विवाह या अन्य शुभकार्य भी पुरुष पंडितों द्वारा ही पूर्ण किए जाते हैं यहां भी महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है।

संपत्ति का समान वर्गीकरण?

बेशक कानूनन पैतृक संपत्ति पर लड़कियों का समान अधिकार है, लेकिन दिल पर हाथ रख कर ईमानदारी के साथ बताइएगा क्या वाकई इस कानून को सामाजिक मान्यता मिली? क्या लोगों ने लड़कियों को उनका अधिकार देना शुरू कर दिया? (कृपया उदाहरण के नाम पर अपवाद न परोसें) 


अपनी पसन्द के कपड़े पहनने का अधिकार?

महिला सशक्तिकरण या महिला अधिकारों के नाम पर बेशक हम नाहक ही अपना कंधा कितना भी थपथपा लें, स्थिति बिल्कुल इसके विपरीत है। आज भी, सिर्फ और सिर्फ लड़कियों के पैरहन पर ही चर्चा क्यों होती है? लड़कियों के संस्कार ही क्यों चर्चा का विषय होते हैं? 

 

संस्कृति, रीति रिवाजों के नाम पर "क्रूरता"

अब आप खुद इस भेदभाव को समझिएगा, अगर लड़के को शादी के बाद अपने घर से अलग होना पड़े तो लड़के और लड़के के परिवार के साथ अनायास ही हमारी सहानुभूति होने लगती है जबकि वहीं रीति-रिवाज़ो के नाम पर लड़कियों को उनके माता-पिता से अलग कर दिया जाता है, उसका घर छुड़वा दिया जाता है जो कि सबसे बड़ी क्रूरता और शोषण है। शादी संस्कार सबसे अधिक भेदभावपूर्ण संस्कार है एवं लड़कियों के विरुद्ध है लेकिन इसका इतना महिमामंडन किया गया कि शादी के बिना जीवन अधूरा समझा जाने लगा।


                       
                          ये तो सिर्फ चंद ही बिंदु है जो बताते हैं कि 21वीं सदी में भी महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिला। बेशक कानून बना दिए गए (जिनमें लूप होल हैं पुरुषों के बचने के लिए) लेकिन उन कानूनों को आज भी सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है। अब भी आप बेझिझक, निडर और ईमानदारी से कह सकते हैं कि हमारे समाज में अब "जेंडर डिस्क्रिमिनेशन" (लैंगिक भेदभाव) नहीं है?