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कामकाजी महिलाओं की परेशानियां

 

आज महिलाएं/लड़कियां अपने कैरियर को लेकर सजग हो गईं हैं। वे आर्थिक सक्षमता के लिए  जी-तोड़ मेहनत कर रही हैं, आर्थिक क्षेत्र में पुरूषों से कंधे से कंधा मिला कर चल रहीं है। परंतु महिलाओं के सामने पुरुषों की तुलना में अधिक चुनौतियों और परेशानियां हैं जिनमे वे आये दिन दो चार होती रहती है।

                आज हमारा ये लेख कामकाजी महिलाओं के जीवन व परेशानियों पर हैं। हालांकि सभी महिलाएं कामकाजी ही हैं, लेकिन पुरुषसत्ता समाज ने कभी भी महिलाओं के श्रम का सम्मान नहीं किया। वे घर -गृहस्थी के कामों में खपती रही और उसके काम को शर्म की श्रेणी से बाहर रखा गया। घर के पुरुषों को यदि काम पर सुबह जल्दी जाना होता तो घर की महिलाएँ उनसे पहले उठकर उनके लिए खाना तैयार करती, उनके जाने की पूर्ण तैयारी करती लेकिन उसका ये श्रम, श्रम न कहलाया। आज भी कामकाजी महिलाएं पुरुषों से पहले ही जगतीं हैं।

            कामकाजी महिला शब्द का प्रयोग प्रायः वैतनिक नौकरी करने वाली महिला से सम्बंधित है। कामकाजी महिलाएं वर्तमान में हर उस क्षेत्र में कार्यरत है जिन पर कभी सिर्फ पुरुषों का एकाधिकार था। महिलाओं ने स्वयं को सशक्त किया, आर्थिक क्षेत्र में कदम रखने पर उस पर दोहरी जिम्मेदारी आन पड़ी। घर बाहर के कार्य ने उसे तनावग्रस्त बना दिया, लेकिन वे लड़ रही हैं इन परेशानियों और चुनौतियों से।

घर के कार्य -: कामकाजी महिलाओं को नौकरी और गृहकार्य में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। बेशक महिलाएं हर क्षेत्र में अपना सफल योगदान दे रही है, परंतु समाज मे बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है महिलाओं को लेकर। आज भी पारिवारिक दायित्व और गृहकार्य को ही महिलाओं के प्रथम और मूल कर्त्तव्य माने जाते हैं। किचन, घर की साफ सफाई बच्चों का पालन-पोषण, बच्चों की पढ़ाई, पेरेंट्स मीटिंग, घर के बुजुर्गों की देखभाल ये सभी कार्य नौकरी के साथ साथ महिलाओं को ही हैंडल करने होते हैं। मातृत्व शारिरिक क्रिया से शरीर दुर्बल हो जाने के कारण दोहरे कार्य से (गृहकार्य और नौकरी) वे तनावग्रस्त हो जाती है। परिजन भी उसे इंसान न समझ मशीन समझ कर ढेरों उम्मीदें लगा उसका जाने- अनजाने शोषण करते हैं।


कार्यक्षेत्र की समस्या :- कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र (ऑफिस) में भी लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पूर्वाग्रह से पीड़ित लोग महिलाओं की कड़ी मेहनत से मिले पदौन्नति का श्रेय उसके लुक्स को, या सिर्फ उसके महिला होने भर को देते हैं, कुछ लोग तो इससे भी गिरी मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं।

                  कार्यक्षेत्र में उनको सेक्सुअली हरासमेंट का भी सामना करना पड़ता है। कई बार तो सीनियर के यौन तृप्ति की मंशा जो नकारने पर सीनियर द्वारा मेंटली ह्रास किया जाता है। पुरुष सहकर्मियों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष द्विअर्थी संवाद/मज़ाक को झेलना पड़ता है असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं को बहुत निम्न वेतन पर ही संतुष्ट होना पड़ता है। मातृत्वता  के लिए पर्याप्त छुट्टी तक नहीं मिलती।


हमारा कर्त्तव्य है कि हमारे साथ काम कर रही महिलाओं का सम्मान करें, मेहनत से पाई पदोन्नति पर प्रशंसा करें न कि फब्तियां कसें। उन्हें बराबरी का दर्जा दें, उनके कार्य को सराहें, लिंग भेदभाव से बचें, उन्हें कंफर्टेबल फील करवाएं।