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समलैंगिकता और सामाजिक दृष्टिकोण


कभी यूँ ही पार्कों, बीचों या सड़कों पर घूमने और टहलने का मन करता है, तो निकल पड़ती हूँ यायावरी के लिए। पार्कों में एकदूसरे में खोए प्रेमी युगल, बीचों में एकदूसरे को चूमते प्रेमी-प्रेमिका, चारों और मध्यम-मध्यम चलती प्रेम की हवाएं वातावरण को सुखद बना देती है। मानो दुनिया से ईर्ष्या, नफरत, कुंठा और सभी नकारात्मकता दुम दबा कर कहीं भाग गई है। दुनिया की भीड़ में खो जाने के डर से अपने प्रेमी/प्रेमिका का हाथ थामे ये प्रेमी युगल दीन-दुनिया से बेखबर एकदूसरे की बातों के सम्मोहन में खोए सड़कों पर टहलते कितने ही प्यारे लगते हैं, सो स्वीट। (किसी किसी को ये अश्लील भी लग सकता है, खैर ये उनकी प्रॉब्लम है, हम प्रेम के प्रेमियों की नहीं) 

अनायास ही कुछ कमी सी कचोटने लगती है, सभी प्रेमी विपरीत-लिंगी, उभयलिंगी या मर्द-औरत (हेट्रोसेक्सयूएल) ही हैं, कोई भी समलैंगिक (गे और लेस्बियन) युगल/कपल नहीं दिखता, आखिर ऐसा क्यों? क्या वे यूँ घूमने या खुलकर सामने आने से कतराते हैं, सुरक्षित महसूस नहीं करते? यदि वे वास्तव में खुद को यूँ सामने लाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे या खुद को समाज में मिक्स नहीं कर पा रहे? तो माफ कीजिये हम एक अच्छा और मानवतावादी समाज नहीं बना पाए। 

बेशक समलैंगिकता को हमारे माननीय न्यायालय ने सहमति दे दी हो, लेकिन हमारे समाज ने इस रिश्ते को अब तक सहमति नहीं दी है। वे इस रिश्ते को हेय, घृणा और हास्यास्पद दृष्टिकोण से देखते हैं। उन्हें लगता है कि ये बीमारी और अप्राकृतिक है जबकि ऐसा नहीं है, समाज को ऐसा सिर्फ अज्ञानता, पूर्वाग्रह और जागरूकता न होने के कारण लगता है।

 एक्चुअल में जो समाज के नियमों या अधिकतर (बहुसंख्यक लोगों) द्वारा नियमित किया जाता है उसे समाज सही और अन्य जो अलग हो उसे गलत मानता है। जैसे हम हर कार्य के लिए दांए हाथ का प्रयोग करते हैं, परन्तु यदि कोई बांए हाथ का प्रयोग करता है तो लोगों को अजीब लगने लगता हैं। (हालांकि अब इसे भी सामान्य लिया जाने लगा है)

माननीय कोर्ट से समलैंगिकता को मान्यता मिलने के बाद भी इस रिश्ते को सामाजिक मान्यता, सम्मान और अधिकार नहीं मिले। मान लीजिये किसी क्लब या डिस्को में कपल एंट्री होती है, तब? तब समलैंगिक युगल को एंट्री नहीं दी जाती, आखिर क्यों? जबकि वे भी प्रेमी-युगल ही हैं। होटल का कमरा भी इन युगलों को नहीं मिल पाता। ये प्रेमी-युगल सड़कों पर हाथ थामे नहीं चल सकते, बीच पर चुम्बन लेते नहीं दिख सकते और न ही किसी पार्क में एकदूसरे की आंखों में डूबते हुए नज़र आते हैं, जो कि बहुत नार्मल है। आखिर ये प्रेमी युगल क्यों नहीं दिखते? क्योंकि आप, हम और ये समाज इन्हें सामान्य नहीं महसूस करवाता। सोचिए शहरों में ये हाल है तो गांव, देहात ग्रामीण क्षेत्रों में क्या माहौल होगा?


समलैंगिक प्रेमी-युगल समाज से ही नहीं अपितु अपनों से, अपने परिवार से, अपने रिश्तेदारों से भी सुरक्षित नहीं। अपने ही लोगों से सुरक्षा के लिए उन्हें कोर्ट से गुहार लगानी पड़ रही है। हाल ही में माननीय मद्रास हाई कोर्ट का रवैया संतोषजनक और राहत देने वाला था बशर्ते समाज उस पर अमल करें। माननीय कोर्ट ने यहाँ तक कह डाला कि जो मेडिकल प्रेक्टिशनर समलैंगिकता को बीमारी बता ठीक करने का दावा करते हैं उनका लाइसेंस रद्द होना चाहिए, हो सके तो स्कूल कॉलेज को  लैंगिक समानता वाले टॉयलेट बनाने चाहिए और आवश्यक हो तो जेल में ट्रांस  कैदियों को अलग रखने की सुविधा होनी चाहिए।

माननीय कोर्ट ने समलैंगिकता पर पूर्वाग्रहों से अलग होने, जानकारी अर्जित करने और समलैंगिकता को और अधिक जानने के लिए इसके मनोविज्ञान जानने की इच्छा जताई, जो कि एक सुखद खबर है। यही इच्छा हमें भी रखनी चाहिए। 

आखिर समलैंगिक कोई क्रिमिनल या अपराधी नहीं, उन्हें भी सामाजिक सम्मान का पूर्ण अधिकार है। हम 21वीं सदी में है, हमें एक्सेप्ट करना ही होगा कि हमेशा किसी लड़की के जीवन में राजकुमार या लड़के के जीवन मे राजकुमारी ही नहीं आएगी।


आइए आप और हम मिल कर इस समाज को समान बनाएं, जो सभी लिंग को समानता, सम्मान, और अवसर प्रदान करे। किसी एक लिंग को भी शर्मिंदा न महसूस करवाएं, सभी लिंग से प्रेम करें। आओ ऐसे समाज का निर्माण करें।

 

"प्रेम असीमित है, बंधनरहित, इसे लिंग में बांधना प्रेम के प्रति अन्याय होगा। प्रेम को बंदी बनाने जैसा होगा"