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भारत की पहली नारीवादी पुस्तक / India's First Feminist Book


आज हमारे पास नारी विमर्श की पुस्तकों के कई विकल्प हैं। पितृसत्ता की बारीख से बारीख परत को हम कई लेखक/ लेखिकाओं की पुस्तकों से समझ सकते हैं। क्या कभी ख्याल आया कि आखिर पितृसत्ता के विरुद्ध, नारी विमर्श पर किस लेखक/लेखिका ने लिखना आरम्भ किया? कौन सी पुस्तक पहली नारीवादी पुस्तक है?


ताराबाई शिंदे

ताराबाई शिंदे जी का जन्म 1850 को, वर्तमान के बुलढ़ाणा प्रांत में हुआ था। उनके पिता हरि शिंदे जी, ज्योतिबाफुले जी के सत्यशोधक समाज संगठन के सदस्य थे। ताराबाई शिंदे अपने परिवार में एकलौती लड़की थी जिसके चार भाई थे। सामाजिक कार्यों लीन होने एवं जागरूक होने के कारण शिंदे जी ने ताराबाई शिंदे मराठी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई। कम आयु में ही उनकी शादी कर दी गयी। 

ताराबाई शिंदे का सामाजिक जीवन 

ताराबाई शिंदे एक निसंतान विधवा थीं, जिनका पुनर्विवाह ब्राह्मणवाद के कारण न हो सका, क्योंकि मराठों  में विधवा विवाह चलन हट गया था। शिंदे सत्यशोधक समाज की संस्थापक सदस्य थीं साथ ही वे सावित्रीबाई फुले एवं ज्योतिबाफुले के साथ मिलकर जाति और लिंग समानता के प्रति समाज को जागरूक करतीं थीं। पितृसत्ता उत्पीड़न के विरुद्ध वे मुखर हुईं। अपनी लेखनी से उन्होंने पितृसत्ता के षड्यंत्र को उजागर ही नहीं किया अपितु धर्म ग्रंथों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए। 19वीं सदी में धर्म ग्रंथों पर दोषारोपण विवादास्पद रही और आज तक भी है।

स्त्री-पुरुष तुलना 

उन्होंने पितृसत्ता के खिलाफ अपने स्वर को लेखनी व पुस्तक द्वारा जन जन तक पहुंचाया जिस कारण कुछ लोगों की नाराजगी का सामना भी करना पड़ा। उनकी पुस्तक "स्त्री-पुरुष तुलना" 1882 में प्रकाशित, भारत की पहली नारीवादी पुस्तक मानी जाती है। जिसमे पितृसत्ता व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने पुस्तक के माध्यम से  विधवा उत्पीड़न पर प्रश्न किया, " यदि किसी की पत्नी मर जाए तब वो दसवें दिन ही दूरी शादी कर लेता है लेकिन विधवा औरत को क्यों इतना प्रताड़ित किया जाता है मानो अपने पति को उसी ने मारा है। समाज द्वारा ये दोहरे मापदंड क्यों?" 


             'स्त्री-पुरुष तुलना' में स्त्री-पुरुष समानता पर बल देते हुए वो पुरुषों से पूछती हैं कि  "पुरुष स्वयं को स्त्री से इतना महान और बुद्धिमान क्यों समझता है? यदि वे इतने ही महान, बुद्धिमान या नायक थे तो अंग्रेजों के अधीन कैसे हुए? 

      
 'तुम ने सब धन दौलत पर वर्चस्व जमा औरत को कोठी में दासी बना, धौंस जमा दुनिया से दूर रखा| उसपर अधिकार जमाया| औरत के सदगुणों को नकार, अपने  सदगुणों का बखान किया। औरत को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया। उसके आने-जाने पर रोक लगा दी। जहां भी वह जाती थी, वहीं उसे उसी के समान अज्ञानी स्त्रियाँ ही मिलती थीं। फिर दुनियादारी की समझ कहाँ से आती'   -  पुरुष -स्त्री तुलना 


उन्होंने अपनी पुस्तक से साधु सन्यासियों पर भी तीखे प्रहार किए, " तुम बहरूपिये बन घूमते हो, लोगों से बाबा कहलवा कर उन्हें ही ठगते हो।  पकवानों का भोग करते हो, साथ ही सुंदर नवयौवना पर नज़र रखते हो।  सन्यासी का सिर्फ स्वांग रचते हो। मन मे ईश्वर के स्थान पर  उन सुंदरियों को रखते हों। आंखें मूंद कर उन्हीं सुंदरियों का चिंतन मनन करते हो। काशी या गंगा नहा कर कोई पापवासना समाप्त नहीं होती, पूरे बगुला भगत हो।  भगवान के नाम के पैसे  उठा कर रंडी के पास जाते हो।"  


           स्त्री-पुरुष तुलना 19वीं सदी का पहला नारीवादी क्रांतिकारी चिंगारी थी जिसने धीरे धीरे आग पकड़नी शुरू की और आज इस आग का सदुपयोग किया जा रहा है। आज नारी विमर्श पर चर्चा होतीं है , अपने अधिकारों के प्रति महिलाएं जागरूक हैं।