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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष


 प्रतिवर्ष 8 मार्च को पूरे विश्व में महिलाओं के प्रति सम्मान प्रदशित कर "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" एक उत्सव के रुप में मनाया जाता है। 

 

               सबसे पहला "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" न्यूयॉर्क शहर में 1909 में पूरे जोर-शोर से आयोजित किया गया। 1917 में सोवियत संघ ने  इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर दिया और धीरे-धीरे ये  आसपास के देशों में आयोजित होने लगा, कुछ जगह तो लोग बैंगनी रिबन पहन कर "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" मनाते हैं। 

 

            अब सवाल ये उठता है कि क्या वाकई "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" मनाने से लैंगिक समानता आयी है? क्या लैंगिक हिंसा बन्द हुई है? वास्तव में, "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" का मूलस्वरूप हम खो चुके हैं, इसे सिर्फ एक अवसर के रूप में मना कर हम अपने जागरूकता, समानता और कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। जबकि, आज भी, अब भी महिलाओं पर हिंसा और भेदभाव बदस्तूर जारी है।

 

क्या है लैंगिक हिंसा

 

समाज द्वारा जन्म से पहले ही लिंग आधारित हिंसा या भेदभाव आरम्भ हो जाता है। लिंग आधारित चयन अर्थात लिंग जान कर बच्चे को गर्भ में स्थान देना अन्यथा गर्भपात करवाना। गर्भावस्था के दौरान गर्भवती स्त्री के साथ मारपीट करने पर भावी बच्चे पर मानसिक, शारीरिक और प्रतिकूल प्रभाव पड़ना। मेल बेबी के लिए जबरदस्ती गर्भधारण करवाना, सामूहिक बलात्कार के दौरान गर्भधारण।

 

               जन्म के बाद शैशवावस्था एवं बाल्यावस्था में लिंग के आधार पर कन्याओं से भेदभाव करना जैसे - :  लिंग के आधार पर शिक्षा में भेदभाव, कन्या हत्या, लिंग के आधार पर भोजन की उपलब्धता पर भेदभाव, जबरदस्ती बाल वैश्यावृत्ति में धकेलना, यौन-उत्पीड़न आदि।

 

                किशोरावस्था के दौरान सबसे अधिक  उत्पीड़न और हिंसा कन्याओं पर ही होती आयी है उदाहरणस्वरूप, प्रेम-प्रसंग में तेज़ाब फेंकना, जान से मार डालना, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, आर्थिक आधार पर यौन शोषण, महिलाओं की तस्करी आम बात सी हो गयी।

 

             युवा-अधेड़-बुजुर्ग महिलाओं पर भी अत्याचार लगातार बढ़ ही रहे हैं। अपने घनिष्ठ पुरुष मित्रों एवं साथी द्वारा  दुर्व्यवहार, दहेज के लिए हत्या, कार्य स्थल पर लिंग-भेदभाव, यौन उत्पीड़न, प्रोमोशन के लिए जबरदस्ती शारिरिक सम्बन्ध बनाने के लिए बाध्य करना, वैवाहिक बलात्कार, ये उत्पीड़न यहीं समाप्त नहीं होता बल्कि वृद्धावस्था तक चलता ही रहता है कई मामलों में देखा गया है कि 60-80 साला वृद्धा को भी बलात्कार का सामना करना पड़ा, विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार एवं आंकड़ें सिद्ध करते हैं कि वृद्धों पर हो रहे अत्याचारों में महिला वृद्धों पर अधिक अत्याचार होते हैं।

 

              आंकड़ें प्रदर्शित करते हैं कि लैंगिक देश में लैंगिक असमानताएं बुरी तरह से हावी है। स्कूलों में कन्याओं की उपस्थिति लड़कों के अनुपात में कम है, महिलाओं की आवाजाही कम, रोजगार के अवसर तो कम ही है साथ ही साथ  यौन हिंसा के प्रति असुरक्षा। देश मे सबसे ज्यादा महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से जूझ रही है।

 

 

              हालांकि लैंगिक समानता के लिए भारत सरकार ने कुछ योजनायें बनायीं है - बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ, लैंगिक अनुपात की समानता के लिए लोगों में जागरूकता, राजीव गांधी योजना (सबला),  इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना,  कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, स्वाधार  घर योजना, महिलाओं के लिए प्रशिक्षण एवम रोजगार कार्यक्रम, आदि कई योजनाएं जो सिर्फ और सिर्फ कागजों में नज़र आती हैं।

 

 

                 इन सब योजनाओं से उलट ज़मीनी स्तर पर महिलाओं के मुद्दे अब भी मुंह बाए खड़े हैं। अब भी महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के प्रति हमारी सरकार जागरूक नहीं है तो नागरिक तो क्या ही होंगे? जब तक लैंगिक समानता के प्रति  समाजिक धारणा नहीं बदलती तब तक कागज़ पर लिखी ये योजनाएं हमें मुंह ही चिढ़ाती नज़र आएगी। अब महिलाओं को देवी की उपाधि नहीं अपितु पुरुषों के समान सामान्य इंसान/मानव की उपाधि चाहिए जिसे गलतियां करने का पूर्ण अधिकार हो। उसे देवी की उपाधि नहीं बराबरी चाहिए हर क्षेत्र में। 

 

             जब तक हम महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण नहीं बदलते तब तक "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" का कोई औचित्य नहीं, फ़िलहाल एक उत्सव की तरह मनाते जाइये और अपनी पीठ थपथपा कर शाबाशी देते जाइये की आपने "अंतराष्ट्रीय महिला दिवस" मना कर महिला सशक्तिकरण की ओर एक महत्त्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।

 

 

(महिलाएं अपने विचारों को कितनी स्वतंत्रता से रख सकतीं हैं ये आप सोशल मीडिया पर देख सकते हैं, जहाँ पर आए दिन उन पर शाब्दिक प्रहार होते रहते है। लैंगिक गालियों का सामना करना पड़ता है। वास्तव में, महिलाएं सोशल मीडिया पर ही सुरक्षित नहीं तो ज़मीनी स्तर पर उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?)