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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं की स्थिति


आज विश्व नारी दिवस है, तो यहाँ धड़ाधड़ पोस्टें आ रही हैं, महिला दिवस पर, महिला सशक्तिकरण, उनको सम्मान और हर प्रकार से आज़ादी का अधिकार देने की. पोस्टें पढ़कर लगता है कि शायद अब सदियों से पितृसत्ता के चलते समाज में अपना प्रभुत्व कायम रखने और महिलाओं को अपने चरणों की दासी, अपनी वासना, हवस की पूर्ति करने भर का एक खिलौना, अपनी क्रूरता, वहशीपन को को झेलने वाली निर्जीव वस्तु समझने वाला समाज शायद अपनी गलती को स्वीकार करके उसको अब स्वीकार करने और समाज में बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, काश यह सच होता. क्योंकि प्रायः ऐसे पोस्ट लिखने वालों में ज्यादातर की कथनी और करनी में ज़मीन आसमान का फर्क होता है|

प्रायः ऐसे लोग ही विचारों में मतभेद होने पर, किसी के द्वारा तर्क के द्वारा निरुत्तर कर दिए जाने पर, और महिलाओं द्वारा इनकी पितृसत्तात्मक मानसिकता पर प्रहार करने पर तिलमिला कर दिमाग में भरे महिला विरोधी ज़हर को उगलते देखे जाते हैं, कई बार तो इनके विचारों में नैतिक गिरावट इतनी आ जाती है कि नीचता को भी शर्म आ जाए, फिर वही लोग महिला सशक्तिकरण का ड्रामा करते हैं तो थोड़ा अज़ीब लगता है. प्रायः महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले, खुद अभी तक महिला को अपनी बराबरी पर देखने को तैयार नहीं हो पाए हैं, न ही रिश्तों में समानता और गरिमा लाने को राजी हुए हैं|

आधुनिक और मानवतावादी, समतावादी होने का ढोंग करने वाले भी समय समय पर असल रंग दिखा देते हैं. ऐसे लोग न तो महिलाओं पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए बात बात पर हाथ उठाने, उनको नीचा दिखाने की अपनी मानसिकता से मुक्त नहि हो पाए हैं, महिला को पितृसत्ता, असमानता और भेदभाव से क्या मुक्ति दिलाएंगे, सबसे बड़ी मिसाल वैवाहिक संबंधों में देख सकते हैं, विवाह चाहे घर वालों की मर्ज़ी से हो या प्रेम विवाह दोनों मामलों में कम ही मामले होंगे यहाँ एक पति अपनी पत्नी को बराबरी का दर्जा देने को राज़ी हो|

नहीं तो हर पायदान पर अपने आप को ऊँचा और सुप्रीम रखने व देखने की मानसिकता ही देखी जाती है, ऐसे मामलों में मुझे लगता है कि महिलाओं को भी समझौता करने की बजाय अपनी शर्तों और नियमों के साथ ही रिश्ते को स्वीकार करना चाहिए, अगर प्रेम किया है तो ज़रूरी नहीं कि आप अपने प्रेमी या पति की हर बात को स्वीकार करो, ऐसा करना भी अपने आप पितृसत्ता की गुलामी को स्वीकार करना है, अगर प्रेम है तो आप ही समझौता क्यों करो, सामने वाला क्यों नहीं, क्यों सामने वाले की पितृसत्तात्मक मानसिकता, उसकी हवस,वहशीपन और क्रूरता को प्रेम के नाम पर सहते रहो|

ठोकर मारो ऐसे रिश्ते को जो आपको बराबरता का दर्जा, आपके स्वतंत्र अस्तित्व और गरिमा को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, जिसके लिए आपकी लियाकत, आपकी योग्यता और विचार कुछ मायने नहीं रखते, बल्कि उसका आपको इज़्ज़त प्रेम, समर्पण आपको स्वीकार करने का पैमाना ही आपकी सरकारी नौकरी, आपकी आमदन हो, ठोकर मारो ऐसे स्वार्थी रिश्तों को. मुझे लगता है कि महिला दिवस मनाना तब ही तर्कसंगत होगा जब हम अपनी मानसिकता को बदलते हुए, अपने कथनी और करनी में समानता लाएंगे, अपने अंदर छूपे हुए वहशी जानवर को निकाल कर स्वतंत्र विचारों के प्रवेश के लिए स्पेस बनाएंगे, यह न हो कि आज आप महिला सम्मान और सशक्तिकरण की बात करो और कल को आपकी मानसिकता महिलाओं को इंसान के रूप में देखकर उनको एक सैक्स ऑब्जेक्ट के रूप में ही देखो, और महिलाओं द्वारा अपने हक के लिए आवाज़ उठाने, अपने दर्द और दासता को समाज के सामने पेश किए जाने किए जाने पर, उनको कुलटा, चरित्रहीन कहने, उनको ब्लात्कार हत्या की धमकी देना शुरू कर दो|

महिला दिवस तब ही मुबारक हो, जब हम मानसिक रूप से बदलाव के लिए अपने आप को तैयार करें, उस पीड़ा, दासता, उन रीतिरिवाजों, मान्यताओं को खत्म करने के लिए आगे आएं जिनके चलते महिला सदियों तक घर की चारदीवारी में पितृसत्ता की दासता और क्रूरता को झेलती आई है. जब तक इसके लिए तैयार नहीं हैं तक अपने आप के समतावादी, मानवतावादी और महिलावादी होने के ढोंग को बंद कर दें. आजकल देखता हूँ कि कुछ लोग अपने आप को वामपंथी और अम्बेदकरवादी बोलते हैं, पर जब बात महिलाओं के हक की हो तो एक दम से अम्बेदकरवाद से मनुवाद पर उतर आते हैं| 

मेरा मानना है कि जब तक आपके मन में सदियों पुरानी मनुवादी जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के लिए प्रेम और सम्मान है तब तक आपका सही शब्दों में एक मानवतावादी और अम्बेदकरवादी बन पाना मुश्किल है. अगर आपकी ज़ुबान पर जय भीम है, पर दिल में मनुवाद और पितृसत्ता ढककती है, 'ढोर गंवार शुद्र नारी यह सब ताड़न के अधिकारी' जैसे शब्दों के लिए आस्ता है, तब तक आपका अपने आपको अम्बेदकरवादी कहना एक ढोंग ही होगा और यह बाबासाहिब डॉ भीमराव अम्बेदकर जी का अपमान ही होगा, जिन्होंने सारी उम्र मनुवाद के खिलाफ लड़ाई में झोंक दी और महिलाओं को पितृसत्ता की गुलामी में मुक्ति दिलाने के लिए मंत्री पद तक को ठोकर मार दी. अपने मन में भरे पड़े मनुवाद और महिला विरोधी ज़हर का आकंलन कीजिए फिर सोचना सही शब्दों में आप समतावादी, मानवतावादी, अम्बेदकरवादी बन भी पाए हो या ढोंग ही कर रहे हो|

 

गुरमीत काफ़िर (JNU)