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पंजी प्रथा


 

 

 क्या है पंजी प्रथा

पंजी प्रथा का आरम्भ लगभग 1310 ई. में मिथिला के कर्णाटवंशीय राजा हरिसिंह देव ने किया था।  राजा हरिसिंह देव मिथिला के बाहर से आये थे, मिथिला ब्राह्मणों में अपनी लोकप्रियता व पहुंच बनाने के लिए उन्होंने पंजी प्रथा की शुरूआत की। इसके लिए उन्होंने स्पेशल कुछ पंडितों/ब्राह्मणों को नियुक्त किया, साथ ही प्रत्येक ब्राह्मणों की वंशावली बनवाई।  साथ ही लोगों के लिए 'अस्वजन प्रमाण-पत्र' अनिवार्य कर दिया। अब कोई भी शादी करेगा तो उसे 'अस्वजन प्रमाण-पत्र' बनवाया ही होगा अन्यथा विवाह वैध नहीं माना जाता।

पंजी प्रथा का प्रभाव


'अस्वजन प्रमाण पत्र' वितरण कार्य मिलने के कारण ब्राह्मण वर्ग की समाज में दबदबा बढ़ गया, भ्रष्टाचार बढ़ गया, अब विवाह प्रमाण पत्र के बदले पैसे मांगे जाने लगे। विवाह, विवाह न रह गया बल्कि धन कमाने का जरिया बन गया।


पंजी प्रथा का महिलाओं पर प्रभाव

 कुलश्रेठता के कारण गरीब, उच्च कुल के बूढ़ों को पैसे दे कर अपनी बेटी बेचने लगे थे। उच्च कुल के उद्भव के कारण समाज मे असमानता फैल गयी, उच्च कुल में जन्म के कारण ब्राह्मण मदांध हो गए। उच्च कुलीन/ मैथिली ब्राह्मण 20-25 शादियां करने लगे, यही नहीं वे पूर्ण बुढ़ापे तक 12-13 साल की लड़कियों से भी विवाह करते। परिणामस्वरूप विधवाओं की संख्या में बढ़ोतरी होने लगी। मैथिल ब्राह्मणों की बहुविवाह प्रथा पर मैथिली के विद्वान जयकान्त मिश्र का मानना है कि पंजी प्रथा के कारण कुलीन प्रथा का प्रसार हुआ और अनेक बाधाएँ उत्पन्न हुर्इं।

                     "स्त्री : संघर्ष और सृजन" के अनुसार बूढ़ा कमजोर, बीमार, निर्धन, अनपढ़ और कुसंस्कारी भी यदि उच्च वर्ग  परिवार से होता तो वह स्वयं को सर्वगुण सम्पन्न समझता था। वह सामान्य परिवार की लड़की से शादी करने के लिए खुद को उपयुक्त समझता। धन के लालच में कई बार तो कुलीन वर्ग के पुरुष 40-50 शादी करते थे। इस प्रथा ने बहुविवाह प्रथा को जन्म दिया।

इस पंजी प्रथा के कारण जातिवाद में भी वर्णवाद का जन्म हुआ। - स्त्री : संघर्ष और सृजन 

पंजीप्रथा पर लिखी बुक्स


डॉ. रामप्रकाश शर्मा, मिथिला का इतिहास, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत 

​डॉ. जयकांत मिश्र, मैथिली साहित्य का इतिहास

पारो, नागार्जुन रचनावली,

रतिनाथ की चाची, नागार्जुन रचनावली