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बलात्कार और हिंसा की भेंट चढ़ती बेटियां / महिलाएँ | Rape Crisis In India


उसका मर जाना ही अच्छा था, उसका ही नहीं बल्कि इस देश को महिलाविहीन हो जाना चाहिए। आखिर जिस समाज में महिलाओं का अस्तित्व नगण्य समान हो वहां महिलाओं का अस्तित्व ही खत्म हो जाना चाहिए। उसे क्या मालूम था? इस समाज मे लड़की होना बहुत बड़ा गुनाह है और दलित होना महापाप है। जिस समाज में लड़कियों/महिलाओं को सिर्फ भोग्या ही समझा जाता हो उस समाज में दलित लड़कियों/महिलाओं को मात्र खिलौना के अलावा क्या ही समझा जाता होगा, जिसे जब मन चाहे रौंद डालें। उसकी जीभ काट डालनी भी ज़रूरी थी, न सुना पाए वो अपने दर्द, अपनी तकलीफ़, अपने घाव, अपने जख्म जो जातीय अहंकार में बलात्कारियों ने उसके शरीर के साथ साथ उसकी अंतरात्मा तक को दे दिए। साथ ही साथ सन्देश है ये तमाम लड़कियों/महिलाओं को खबरदार! जो किसी ने आवाज़ उठाने की हिमाकत की तो..... यूँ ही काट दी जाएगी तुम्हारी ज़ुबान। सहयोग करती रहो उनके बलात्कार की प्रक्रिया में, बिल्कुल विघ्न न डालो उनके इस घृणित कृत्य में। अगर तुमने ज़रा सा भी बलात्कार की प्रक्रिया में, उनके मनोरंजन में खलल डाला तो तोड़ दी जाएगी तुम्हारी गर्दन। हे लड़कियों/महिलाओं क्यों भूल जाती हो तुम अपना स्थान, आखिर तुम हो ही ताड़ना की अधिकारी। कितनी भी ऊंचाइयों को छू लो, चाहे शिक्षा में, नौकरी के किसी भी क्षेत्र में या किसी भी ऊंचे से ऊंचे ओहदे में रहो, लेकिन रहोगी तो उनके ही अधीन। भूल गईं तुम? आखिर तुम पुरुषों की खेती ही तो हो। (मनुस्मृति नवें अध्याय के श्लोक 33 से लेकर 42 तक) अब जहां नारी भोग्या है, नर्क का द्वार है, पुरुषों की खेती है, जिसे पुरुषों के अधीन रहना आवश्यक है, जहाँ सभी धर्म महिला विरोधी हो और न्याय व्यवस्था कछुआ गति से चलता हो वहां बलात्कार और हत्या पर अचंभा कैसा? अब तक तो आदत पड़ जानी चाहिए।



#क्या कहते हैं नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े


भारत में बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2018 में 33,356 बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। जहाँ बलात्कार की घटनाएं बढ़ी है वहीं बलात्कारियों को सजा देने की दर घटी है। ये दर 2018 में लगभग 27% जबकि 2017 में 32.2% थी।
 

समाज में बलात्कार पीड़िता का स्थान
 

Rape

 


पीड़िता के लिए न्यायिक प्रक्रिया से गुज़रना दुबारा बलात्कार को महसूस करने जैसा ही होता है। न्यायिक प्रक्रिया के प्रथम चरण यानी थाने में पुलिस का असंवेदनशील व्यवहार, पूर्वाग्रहों से ओत-प्रोत मस्तिष्क और सवाल जवाब का तरीका, मेडिकल जांच और कोर्ट में विरोधी वकीलों द्वारा ऊलजलूल प्रश्न और टिप्पणियां पीड़िता के अंतर्मन को छील कर रख देती है यही कारण है कि बहुत सी लड़कियां/महिलाएं बलात्कार की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करवाती। हमारा समाज, जी हां! आप, हम और सभी पीड़िता की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर जितना जस्टिस की गुहार लगाते हैं, सड़कों पर कैंडल मार्च निकालते हैं, आंदोलन करते हैं ठीक इसके विपरीत पीड़िता के जिंदा रहने पर बहुत लापरवाह, पूर्वाग्रहों से ग्रसित, खुश्क, रूखे और बेहद असंवेदनशील हो जाते हैं। कुछ लोग पीड़िता को ही दोषी मान कर उससे कटने लगते है, उसे बार बार वो घटना उसकी गलती के रूप में दिखाई जाती है। उस पर पाबंदियां लगाई जाती है मानो वो पीड़ित नहीं बल्कि दोषी हो। कई केस में तो गांववाले पीड़िता और उसके परिवार वालों का सामाजिक बहिष्कार तक कर देते हैं, और अगर पीडिता दलित और बलात्कारी उच्च वर्ण से हो, तो स्थिति और दयनीय हो जाती है। मानो पीड़िताओं का मरना अनिवार्य हो सामाजिक सहानुभूति और न्याय के लिए।


#आखिर क्यों बढ़ते जा रहे हैं बलात्कार
 


कुछ बेहद संकीर्ण मानसिकता के लोग इस कृत्य के लिए स्वयं पीड़िता या महिलाओं पर ही आरोप की गठरियां बांध बांध कर रख देते हैं। कभी महिलाओं के कपड़ों पर तो कभी महिलाओं की स्वतंत्रता पर दोषारोपण होता है, जो कि फालतू और निरर्थक है। अब वक्त आ गया है, "बलात्कार क्यों बढ़ रहे हैं" पर गहराई से चिंतन, मनन और आपस में चर्चा करने का। हमें विचार करना होगा कि आखिर क्या कारण है कठोर से कठोर सजा होने के बाद भी बलात्कार बढ़ने का? पहले तो हमें मानना होगा कि जैसे पेट की भूख वैसे ही शरीर की भूख भी मूलभूत है अतः जिस प्रकार नैतिकता और संस्कारों को पढ़ाया जाता है, ठीक ऐसे ही स्कूलों सेक्स एजुकेशन भी हो। सेक्स को दबाने के बजाय उस पर बात की जाए। केस का निपटारा जल्द हो ताकि पीड़िताओं को न्याय के साथ साथ आरोपियों को सजा जल्द मिले।


#महिलाओं की सामाजिक स्थिति


महिलाओं को सदियों से और आज भी मात्र एक भोग्या के रूप में देखा गया, केवल हांड-मांस का एक लोथड़ा जिसे जब मर्जी नोचा जा सकता है। आज महिला सशक्तिकरण और महिला समानता कागजों तक सीमित है जो ज़मीनी स्तर पर बहुत कम है। पुरुषों के लिए औरत हमेशा से एक सॉफ्ट टारगेट रही है, अपना जातीय अहंकार दिखाना हो तो दलित महिलाओं का बलात्कार करो, पारिवारिक रंजिश निकालनी हो तो उस घर की इज्जत यानी उस घर की महिला को अपने पुरुषत्व का प्रदर्शन करो, कहीं हिंसा हो तो दूसरे जाति और धर्म की औरत का बलात्कार करो। सच तो ये है कि पुरुष अपनी लड़ाई औरतों से लड़ता रहा है। जब तक महिलाओं को लेकर धारणा नहीं बदलेगी उन्हें मात्र भोग्या या इज्जत न समझ कर एक इंसान नहीं समझा जाएगा उस पर अत्याचार बदस्तूर रहेगा।

 

 

 


महिला उत्पीड़न के 2018 में 58.2 फीसद केस दर्ज हुए जो 2019 में बढ़कर 62.4 फीसद हो गए।

महिलाओं के प्रति अपराध पिछले साल के मुकाबले 7.3% बढ़े हैं।
 

 


"एक लड़की हमेशा अपने पिता के संरक्षण में रहनी चाहिए, शादी के बाद पति उसका संरक्षक होना चाहिए,

पति की मौत के बाद उसे अपने बच्चों की दया पर निर्भर रहना चाहिए, किसी भी स्थिति में एक महिला आज़ाद नहीं हो सकती." - मनुस्मृति, पांचवां अध्याय, 148 वां श्लोक

 

 


अस्वतंत्रा: स्त्रियःकार्योःपुरुषैःस्वैर्द्दिवानिशम्।
विषयेषुचसञ्ज्ञन्त्यःसंस्थाप्याञात्मनोवशे॥
अर्थात
परिवार के पुरूषों का यह कर्तव्य है कि वे अपने परिवार की स्त्रियों को दिन-रात अपने अधीन रखें।

यदि स्त्रिया विषय-वासना की ओर झुकती हैं, तो पुरूषों का कर्तव्य है कि उन पर नियंत्रण करें।

 

 

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी - तुलसी दास

अर्थात

ढोल, गंवार, शुद्र, पशु और नारी ये सब पीटे जाने लायक हैं।

 

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Neha 2020-10-01 10:16:37

जो ये काम करते है उन्हें चोहराए पर खड़ा कर दो पब्लिक अपने आप कर देगी जो करना है क्योंकि ये काम हिजड़ों के बस्की नहीं है सरकार अपनी m,c रही है उनकी नेतो की बेटियां सुरक्षित है सालो को चोहरयाए बांधो जैसे लड़कियों के दिलो m देहशत होती है ऐसी इन लोगों के दिल m भी होगी जब पब्लिक की मार पड़ेगी

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Bharti sharma 2020-10-01 10:39:35

???????? आपकी हर शब्द में सच्चाई है लड़की को एक वस्तु बना कर रख दिया है।

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Sunder Pal 2020-10-01 14:52:51

Manisha's convicts should be punished.

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