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समलैंगिकता क्या है?


 

क्या है एलजीबीटीआइक्यू?


 लेस्बियन : लड़की का लड़की से प्रेम को लेस्बियन श्रेणी में माना जाता है, इससे जुड़ी भ्रांति है कि दो लड़कियां में से एक लड़की, लड़का टाइप होगी जिसका व्यक्तित्व लड़कों जैसा होगा, जिसे buch कहा जाने लगा, वहीं जो लड़कीं टाइप होगी उसे femme कहा जायेगा जो कि पूर्णतया मिथक है।
 
गे : लड़के का लड़का के प्रति आकर्षण गे श्रेणी में आते हैं।

बाय-सेक्सुअल : जो औरत और पुरुष दोनों के प्रति आकर्षित हो, बाय-सेक्सुअल कहलाते हैं।

ट्रांसजेंडर : थर्ड जेंडर जो शरीर से तो कुछ और हों और अंदर से (मन से) कुछ और, जैसे कोई शरीर से तो पुरुष है लेकिन खुद को महिला महसूस करता है। यही लोग रीअसाइनमेंट ऑपरेशन कर मनचाहा शरीर पाते हैं।

इंटरसेक्स : ये वे लोग हैं जिनके जननांगों से कन्फर्म नहीं होता कि वो क्या है, जिन्हे हम हिजड़ा नाम से जानते हैं।

क्वैर (QUEER) -: वे लोग जो कंफ्यूज हैं कि वो कौन हैं लड़का या लडकी, वे अपनी भावनाओं को समझ नहीं पाते और कंफ्यूजन की स्थिति में रहते हैं।

#धर्म और समलैंगिकता

बेशक कानूनन समलैंगिकता को मान्यता प्रदान कर उसे अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया हो परन्तु समलैंगिकता पर बहस छिड़ी हुई है। कुछ लोग इसे धार्मिक दृष्टि से पाप बताते हैं तो कुछ लोग मानसिक रोग। 

इस्लाम धर्म -: इस्लाम मे समलैंगिकता को हराम और गुनाह माना गया है। हालांकि इस्लामिक धर्म गर्न्थो में इसका बहुत अधिक उल्लेख नहीं मिलता लेकिन हदीस में कहीं कहीं इसका उल्लेख मिलता है। हदीस के अनुसार जो महिला ऐसे संबंधों एवम कृत्य में पाई जाए उसे सजा अवश्य मिलनी चाहिए। क्योंकि समलैंगिकता गुनाह है। कई इस्लामिक देशों में भी समलैंगिकता पर फांसी का प्रावधान है।

ईसाई धर्म -:  ईसाई धर्म के अलग अलग पंथों के अलग विचार, मान्यताएं एवं मिली जुली प्रतिक्रिया हैं।  रोमन कैथोलिक चर्च के अनुसार समलैंगिकता "सिन" यानी पाप है, वहीं  ऑर्थोडॉक्स चर्च समलैंगिक सम्बन्धों के प्रति उदार दिखते हैं। अधिकतर पोप का मानना है कि समलैंगिक भी उसी गॉड की संतान हैं अतः उन्हें भी प्रेम करना चाहिए।

 जैन धर्म -:    जैन धर्म में भी समलैंगिकता अमान्य है, जैन ग्रन्थ " श्रमण" के अनुसार उन्हीं सम्बन्धों को सही माना गया है जो सृजन करते हैं, अतः जैन धर्म समलैंगिकता के पक्ष में नही है क्योंकि इससे सन्तानोउत्पत्ति नहीं होती।

 सिख धर्म -:      सिख धर्मग्रंथों में समलैंगिकता पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है, उसमें सिर्फ जीने के तरीकों के बारे में बात की गई है, हालांकि कुछ सिख संगठनों ने इसे मान्यताओं के विरुद्ध बताया है।


  बौद्ध धर्म -:       बौद्ध भिक्षुओं को आध्यात्मिकता के कारण यौन सम्बन्धों से दूर रहने को कहा गया है, वहीं समलैंगिकता पर कुछ नहीं कहा गया वहीं हीनयान बौद्ध पंथियो ने समलैंगिकता को हीन और दुर्व्यवहार नहीं माना।

हिन्दू धर्म -:  आज बेशक कुछ लोगों की मानसिकता समलैंगिकता पर संकुचित हो गयी हो परन्तु हिन्दू धर्म मे समलैंगिकता को पूर्ण मान्यता प्राप्त थी जो कि खजुराहो की इमारतों पर उकेरी गई आकृतियों से प्रूफ होता है। जिसमे पुरुष महिला सम्भोग क्रिया,  पुरुषों का जानवरों के साथ संसर्ग,  और यहीं पर समलैंगिकता के छाप भी मिलते हैं।  

              शिव का अर्द्ध नारीश्वर रूप, विष्णु का मोहिनी रूप धारण कर शिव को रिझाना, महाभारत में शिखंडी का लिंग परिवर्तन एवम अर्जुन का बृहन्नला होना कुछ भी गलत नहीं है, अतः हिन्दू धर्म समलैंगिकता को लेकर उदार रहा है। 

  समलैंगिकों का अस्तित्व भी हो स्वीकार

 समलैंगिकों को भी बिना कानून और सामाजिक हस्तक्षेप के समानता और सम्मान के साथ जीने का संवैधानिक अधिकार हैं। निजी सम्बन्ध, पसन्द नापसंद एक बेहद व्यक्तिगत मामला है, अतः उसमें आपको, हमें और समाज को दखल देने का कोई अधिकार नहीं। क्योंकि हमने सिर्फ और सिर्फ पुरुष-महिला संबन्ध देखे हैं या सिर्फ समाज द्वारा ऐसे ही रिश्तों को मान्यता मिली है इसीलिए हम समलैंगिकता को शायद स्वीकार नहीं कर पा रहे, उसे अप्राकृतिक समझते हैं जबकि ये बिल्कुल प्राकृतिक और सामान्य है। हमने अपने आसपास सिर्फ और सिर्फ पुरुष-महिला के सम्बंध देखे और उसे सामान्य और फिट की श्रेणी में रख दिया, ये उतना ही सामान्य है जितना कि सीधे हाथ के प्रयोग के बजाय उल्टे हाथ का उपयोग। समलैंगिकता को नकारना, कुँए के मेढ़क की सोच के समान है जिसने कुएं से बाहर की दुनिया को देखे बिना कुएं को ही समस्त ब्रह्मांड मान लिया। हमने आपने भी संकुचित मानसिकता का आवरण ओढ़ लिया कि पुरुष-स्त्री से इतर कोई और सम्बन्ध हो ही नहीं सकते, इस सोच से हमे बाहर निकलना ज़रूरी है।